बुधवार, 14 जून 2017

भीगा आंगन, एक खिड़की और दो उदास चेहरे

प्रेम जैसे मामलों में स्मृतियों के द्वार तभी खुलते हैं जब संभावनाओं के दरवाजे बंद हो जाते हैं । एक उम्र के बाद बारिश के साथ पुरानी प्रेमिकाओं को याद करने का मौसम शुरू हो जाता है । मैं खिड़की के पास बैठा हूं और बाहर पानी के साथ यादें बरस रही हैं । मन गूंगे का गुड हो चला है , किसी को बता भी नहीं सकता कि किस चीज से भीग रहा हूं । बल्कि अभी कोई आ कर ताड़ ले तो छुपाना मुश्किल । हवाएं चुगलखोर हैं वरना बरसात के मौसम को कौन अहमक बेईमान कह सकता है । जाने क्यों गरमी या ठंड के मौसम में प्रेमिकाएं याद नहीं आतीं । ना सही गरमी में पर ठंड़ में तो आ ही सकती हैं । एक बार तो स्मृति के प्रतीक स्वरूप उनके भेंटे स्वेटर में घुसने की कोशिश की, जो बड़े जतन से सम्हाल कर रखा हुआ था । पता चला कि स्वेटर के साथ स्मृतियां भी टाइट हो गई हैं । दम घुटने लगा तो तौबा के साथ बाहर निकले और पूरी ठंड़ वैधानिक स्वेटर में काटी । यों देखा जाए तो गरमी का मौसम इस काम के लिए मुफीद है । उमस भरे दिनों में वैसे भी कुछ और करने का मन नहीं होता । फुरसत से उदास हो पंखे के नीचे बैठो और याद करो मजे में । लेकिन संविधानाअपनी सारी दफाओं के साथ इस उम्मीद से सामने होती हैं कि आप निठल्ले न रहें, बैठे-बैठे तसव्वुरे-जाना किए रहें । लेकिन पसीना बहुत आता है कमबख्त, कुछ गरमी से और उससे ज्यादा दीदार-ए-हुस्न-ए-मौजूद से । ज्यादातर वक्त सुराही-लोटा बजाते गुजर जाता है । लेकिन बारिश की उदासी मीठी होती है , जैसे हवाओं में आम की मीठी महक घुली हो ।
तजुर्बेकार स्मृतिखोर बारिश  के चलते खिड़की पर उदास बैठने से पहले हाथ में एक मोटी किताब ले लेता है । मोटी किताब का ऐसा है कि वे पढ़ने के काम कम , सिर छुपाने के काम ज्यादा आती हैं । हाथ में मोटी किताब हो तो ज्यादातर मामलों में होता यह है कि लोग आपसे बात नहीं करते, पत्नी भी नहीं । गोया कि किताब न हो राकेट लांचर हो । कालेजों में प्रोफेसरान मोटी किताब थामें निकल भर जाएं तो भीड़ रास्ता दे देती है । ये तजुर्बे की बात है, चाहें तो इसे राज की बात भी समझ सकते हैं । अक्सर मोर्चों से स्थूलांगिंनियां मोटी किताब देख कर सिकंदर की तरह लौटती देखी गईं हैं ।
हां तो मैं बारिश  शुरू होते ही हाथ में मोटी किताब ले, बाकायदे क्लासिक उदासी के साथ खिड़की के किनारे बैठ जाता हूं । अब आगे का काम मधुरा को करना था । मधुरा ! समझ गए होंगे आप । वो जहां भी होगी, उसे अवश्य पता होगा कि बारिश का मौसम है और वादे के अनुसार खिड़की पर उदास बैठा मैं उसे याद कर रहा हो सकता हूं । ठीक इसी वक्त आकाश  में एक बदली एक्स्ट्रा आ जाती है और साफ दिखाई देता है कि आंगन कुछ ज्यादा भींग रहा है । इसका मतलब कनेक्टिविटी बराबर है ! अब फालतू हिलना-डुलना , चकर-मकर होना रसभंग करना है । जैसे एक बार ट्रांजिस्टर  बीबीसी पकड़ ले तो जरा सा हिलने खिसकने से आप विश्व समाचारों से वंचित हो जाते हैं । बरसात में ऐसे ही यादों के सिगनल होते हैं, जरा एन्टिना हिला कि गए ।
‘‘ सुनो ..... क्या कर रहे हो ? ’’ इधर कान में शब्द  चेंटे उधर आकाश  में बिजली कड़की ।
‘‘ किताब पढ़ रहा हूं ...... दिखता नहीं है क्या !?’’ जाने स्त्रियां पत्नी बनते ही थानेदार क्यों हो जाती हैं ।
‘‘ किताब ! .... हाथ में तो भगवत् गीता है ! ’’
‘‘ हां ! ..... तो ? ’’
‘‘ आपने उल्टी पकड़ी हुई है । ’’
‘‘ अं .... हां , पता है । मैं अभी सीधी करने ही वाला था कि बिजली कड़क गई । ’’
‘‘ झूठ ..... सच सच बताओ उसी कलमुंही को याद कर रहे थे या नहीं ? ’’
‘‘ नहीं ... मेरा मतलब है कि किस कलमुहीं  को !!?’’
‘‘ तुम्हारे हाथ में गीता है , कसम खाओ कि जो कहोगे सच सच कहोगे । ’’
‘‘ इसमें कसम खाने वाली क्या बात है !?.... तुम भी बस ।’’
‘‘ ठीक कहते हो , रंगे हाथ पकड़े जाने पर कसम की क्या जरूरत है । ’’
‘‘ अब ऐसे बारिश  के मौसम में कोई याद आ जाए तो गुनाह थोड़ी है । ’’
‘‘ गुनाह नहीं है !? खाओ गीता की कसम । ’’
‘‘ हां गुनाह नहीं है , गीता की कसम । ’’
‘‘ तो ठीक है , थोड़ा उधर खसको, जगह दो । मुझे भी किसी की याद आ रही है । मेरा आंगन भी भीग रहा है । कुछ देर मैं भी उदास हो लूं । ’’
आंगन लगातार भीग रहा था, खिड़की उतनी ही खुली थी, भीतर दो उदास बैठे थे । लेकिन मेरी उदासी अब उतनी क्लासिक नहीं थी ।   

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गुरुवार, 4 मई 2017

मोगरी मसाला


दुल्हन को सरकार की तरफ से मोगरी मिली है यह पता पड़ते ही सास ने कपड़ों का ढेर लगा दिया. किसी ने मोगरी के साथ नत्थी निर्देशिका की ओर ध्यान ही नहीं दिया कि पी कर आये (केवल अपने) पति की धुलाई के आलावा अन्य किसी प्रकार से इसका उपयोग नहीं किया जा सकेगा. लेकिन नई ब्याही बहु है और अभी घर सास का है. जाहिर है इस घर में सास से बड़ी सरकार कौन !! वे अधिकार संपन्न और अनुभवी हैं, बेहतर जानती हैं कि मोगरी से कब क्या किया जा सकता है.
सरकार चाहती है कि परिवार की परम्परागत बुनियाद में बदलाव हो. प्रेम घिसा पिटा और फ़िल्मी हो चला है. प्रेम के ही कारण सांस्कृतिक पतन हो रहा है. मोगरी आज के समय की जरुरत है. सरकार को पता है कि आज जो शादी कर रहा है कल मयखाने भी जरुर पहुंचेगा. मयखानों में अच्छी व्यवस्था है, हजारों करोड़ के राजस्व का सवाल है जी. लेकिन शराबबंदी का शोर विपक्ष की करतूत है. प्रदेश भर  की मातृशक्ति हल्ला मचा रही हैं. यह दांव है, किसी मुद्दे पर महिलाओं को एक जुट करके सिर कर दो और देखो तमाशे. ये अच्छी राजनीति नहीं है. सरकार को आदमी-औरत दोनों के वोट मांगता. शराबबंदी कर दें तो आदमी गए, नहीं करी तो औरतें. अनारकली बना दिया सरकार को. एक जीने नहीं देंगे दूसरे मरने नहीं देंगे.
सरकार को सब तरफ से सोचना पड़ता है. लोग होश में रहने लगे तो हजारों सवाल करेंगे. धार्मिक यात्राओं और भोजन-भंडारों की भी एक सीमा होती है. जनता सिर्फ इनके भरोसे तो हाँकी नहीं जा सकती है. और अगर बंद कर दी तो साहित्य का क्या होगा ! कवि कविता लिखना बंद कर देंगे. पुरस्कार लौटने लगे तो प्रदेश भर में नए काउंटर खोलना पड़ जायेंगे. वे कविता से जनता को सुलाये रखते हैं, इससे सरकार के हाथ मजबूत होते हैं. लोग वैसे भी सरकार को साहित्य के प्रति शुष्क मानते हैं. यह चिंता की बात है कि शराबबंदी कर दी तो प्रदेश में नया साहित्य कहाँ से आएगा ! उठाने वाले तो ये सवाल भी उठा रहे कि हुजूर को ये आइडिया किधर से मिला कि मोगरी से शराबबंदी की जा सकती है. कहीं तो कारगर हुआ होगा. बहुत से अफसरान नहीं पीते, लेकिन क्यों नहीं पीते यह अब समझ में आ रहा है. अफसर अनुभवी है, और चाहते हैं कि जनता भी अनुभव करे. मिडिया को इतना बुद्दू मत समझो आप लोग.
यहाँ तक तो ठीक है, मोगरी-स्ट्राइक को लेकर तीसरी पार्टी कह रही है कि ये सरकार की चाल है. पीने वालों पर हेलमेट खरीदने का दबाव बनाया जा रहा है. इसके लिए कम्पनियों से भारी डील हुई है. अभी तक आदमी पीता था और चला जाता था. अगर घर को मोगरी मैदान बना दिया गया तो कौन समझदार घर लौटेगा. राजस्व बढ़ाने की यह सोची समझी चाल है. एक मोगरी से सबको साध रही है सरकार !!

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शनिवार, 8 अप्रैल 2017

इधर बात, उधर चीत

ज्यादातर लोग मानते हैं कि हल जो है निकलने की चीज होता है. हल की दूसरी विशेषता यह भी है कि वह हर किसी के पास होता है. बस समस्या को दिखना भर चाहिए, हल निकलने लगता है. जिनके पास निजी और स्थानीय समस्याओं  का हल नहीं होता है वे प्रायः राष्ट्रिय समस्याओं के हल अपनी जेब में तैयार रखते हैं. हल की तासीर के हिसाब से यों तो कई प्रकार के होते हैं लेकिन ज्यादातर मामलों में ठोस और पुख्ता होते हैं. जो हल ठोस और पुख्ता नहीं होते हैं उन्हें टेम्परेरी या कामचलाऊ माना जाता है. जैसे किसी किसी मंत्री को अपमानित करने के लिए उसके पुतले को पीट लिया जाता   है.  ठोस हल आसानी से निकलता नहीं है, उसे बातचीत या घिस घिस करके निकलना पड़ता है. दोनों विधाओं में अंतर होता है, जो समझदार होते हैं वो बातचीत करते हैं और घिस घिस करने वाले अपने आप को समझदार मानते हैं. कभी कभी एक पार्टी बातचीत करती है और दूसरी घिस घिस, तो हल निकलने की बजाय और अंदर धंस जाता है. धंसे हुए हल के मामले में संसद, शासन या कोर्ट भी लाचार हो जाते हैं. हालाँकि कई बार हल इतने सीधे-सरल होते हैं कि पांच अंगूठाछाप सरपंच-पति भी बैठ कर हुक्का पीते हुए चट्ट से निकाल लेते हैं. गहरे फंसे हल को निकलने के लिए ज्यादा लोग और सिरफोड़ मशक्कत लगती है. लेकिन आज का आदमी ठहरा विज्ञानखोर. खोदने लगे तो तेल भी ऐसे निकल लेता है जैसे बच्चों का खेल. कभी जब खुदाई में इतिहास निकल आता है तो बरसों यह समझने में लग जाते हैं कि जो निकला है समस्या है या हल है !! अगर समस्या निकली है तो ठीक, इसका हल भी निकल ही लिया जायेगा. लेकिन कई बार खुदाई में हल ही निकल आता है तो उसके लिए समस्या ढूँढना इतना कठिन हो जाता है जितना रियल लाइफ में बद्रीनाथ के लिए दुल्हनिया खोजना.
हल को लेकर साफ साफ पता नहीं चलता कि आखिर वो है क्या ! लगता है कि समस्या एक हाथी है और हल, .... हल अन्धों का हाथी है. हाथी छोटा या बड़ा हो सकता है इससे हलधरों को कोई फर्क नहीं पड़ता है. वे हर समस्या के लिए प्रामाणिक दुम, सूंड या पैर पकड़े खड़े हैं. समस्या की दो गज जमीन दिखाई देते ही जबरिया जुताई शुरू हो जाती है. इधर कुछ दिनों से चर्चा है कि बातचीत से हल निकला जायेगा. टीवी वाले लोगों को बैठा बैठा कर बातचीत करवा रहे हैं लेकिन हल है कि निकलता ही नहीं. लेकिन समस्या जरुर एक की चार हो जाती है. कुछ लोग यह भी कहते हैं कि जिस गॉव जाना नहीं उसकी बात ही क्यों करना !! लेकिन मेनेजमेंट यह कहता है कि बात करते रहो एक न एक दिन गॉंव हाथ लग ही जायेगा. प्रस्तावक इंतजार कर रहे हैं, सामने वालों के हाँ करते ही बसंती को आगे कर देंगे. फिर देखते हाँ कौन वीरू मैदान मरता है.
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बाबा के कटोरे में ......


‘‘ लोगो ! ... मुझे सन् २०२९ का समय दिख रहा है .... बाबा ने अपने कटोरे में झांकते हुए कहा.
उपस्थित जन चौंक पड़े. एक बोला,- बाबा सरकार किसकी है !? !
सरकार देसी है. मंत्री घोड़ों पर चल रहे हैं । प्रधान मंत्री हाथी पर बैठ कर नगर भ्रमण को जा रहे हैं । सैनिकों  के हाथ में बंदूकें नहीं भाले बरछी हैं । जनता प्रजा में बदल चुकी है और महाराज की जेजेकार कर रही है. ......
ओ बाबा, ... मोबाईल पर बाजीराव मस्तानी देख रहे हो क्या !?
मोबाईल नहीं है बच्चे, ये करिश्माई कटोरा है, इसमे अतीत नहीं भविष्य दीखता है । मुझे वही भविष्य दिख रहा हैं जैसा कि आप लोग बना रहे हो । आप लोग बोलो तो आगे की बात कहूं ना बोलो तो नहीं कहूं......’’ । बाबा ने पंचघातु की बनी अपनी थाली जिसमें पंचतैल यानी पांच तरह का तैल भरा है, में झांक कर देखते हुए कहना शुरू किया। आसपास इकट्ठा लोग चमत्कार की उम्मीद से ही खड़े थे ना कैसे बोलते।  
बाबा बोलते रहे, - पर्दा प्रथा है, औरतें बाहर नहीं निकलती हैं , सड़कों पर पीली धूल फैलाई गई है, इससे गन्दगी हो रही है लेकिन परम्परा का पालन करते हुए सब प्रसन्न हैं । जो प्रसन्न नहीं हैं वे डर के मारे प्रसन्नता व्यक्त कर रहे हैं । पूजा स्थलों पर रजिस्टर रखे हैं जिस पर भक्तो की उपस्थिति लगायी जाती है । सबके माथे पर शिखा यानी चोटी है, जिनके नहीं है और वे भी जो गंजे हैं उन्हें दण्डित किये जाने का प्रावधान है.बाल विवाहों का चलन शुरू हो गया है.....    बाबा ने बताया.
आप लोग भी मेरी तरह समझदार हैं सो यह बताने की कतई जरूरत नहीं है कि बाबा पहुंचे हुए हैं। मुझे भी किसी ने नहीं बताया था कि वे पहुंचे हुए हैं लेकिन मैंने एक झटके में मान लिया कि वे पहुंचे हुए हैं। एक बार आदमी बाबा बन जाए तो उसे पहुंचा हुआहोने से कोई रोक नहीं सकता है, कानून भी नहीं और जमाना तो मानने के  लिए उधार ही बैठा रहता है। जब सब किसी को पहुंचा हुआ मान लें तो आपको भी मान लेना चाहिए, इसी को परंपरा का पालन करना कहते हैं। सीधे सरल यानी गऊ टाइप आदमी की यही पहचान होती है कि जब भी कोई पहुंचा हुआ दिखे वह सीधे उसके चरणों में पहुंच जाए। इधर बाबा आए हैं तभी से आसपास वाले घेरे खड़े हैं। चुनाव दूर हैं इसलिए पानी की समस्या इधर रोजी-रोटी की समस्या से भी बड़ी हो गई है। नल आते हैं और चिरंजीव भवकह कर फौरन चले जाते हैं। जैसे नारद नारायण-नारायण कहते आते हैं और वैसे ही नारायण-नारायण कहते चले जाते हैं। टेंकर वाला पानी ले कर आता है तो रिश्ते-नाते, मित्र-मोहब्बत, पास-पड़ौस सब मिथ्या हो जाता है । गीता में लिखा है कि इस संसार में कोई किसी का संबंधी नहीं, कोई सगा नहीं, सब प्यासी आत्मायें हैं और टेंकर के आते ही पहले अपना बरतन भरने में लग जाती हैं। वृद्धजन कभी भगवान से सांसें मांगा करते थे अब पानी मांगते हैं। न ढंग की सांसे मिलती हैं न पानी ।
बादल आते हैं भरे-भरे से लेकिन डाकिये की तरह हमारा घर (क्षेत्र) छोड़ कर आगे निकल जाते हैं। एक बार अधीर हो मैंने डाकिये से पूछा भइया सबके यहां चिट्ठी देते हो लेकिन मेरे यहां से ऐसे ही निकल जाते हो !!उसने टका सा जवाब दिया-तुम्हारे नाम की आएगी तो दूंगा नहीं क्या !! मैं बादलों से अगर ये  सवाल पूछूं तो वे शायद यही जवाब देगें। इसलिए हिम्मत नहीं होती है ।
अखबारों में रोज छप रहा है कि पानी बचाओ। लोगों को समझ में नहीं आ रहा है कि जब है ही नहीं तो बचाएं कैसे। सारे लोग चर्चा में पानी-पानी कर रहे हैं। मेहमान आए तो पानी-चाय, नेता आए तो पानी-हाय, लड़का आए उछल के नहाय, लड़की आए तो गगरी उठा के जाय । कवि रहीम होते तो लिखते कि - रहिमन पानी प्रेम का, मत ढोलो छलकाए, ढोले से न मिले, मिले मैला पड़  जाय. नलों, टंकियों, बाल्टियों के अलावा सब तरफ पानी पानी की पुकार । ऐसे में बाबा आ गए पहुंचे हुए तो उनसे पानी के अलावा कुछ और तो पूछा नहीं जा सकता था।
‘‘ बाबा ये बताइए कि आगे पानी का कैसा क्या रहेगा ?’’ एक मुरझाये मनी प्लांट ने पूछा.
बाबा अभी भी पंचतैल में झांक रहे हैं। ऐसे जैसे कि आजकल हर कोई अपने स्मार्ट फोन में झांकता रहता है। बोले - अभी का तो नहीं पंद्रह साल बाद का दिख रहा है ..... कहो तो बताऊँ ?’’ जवाब में एक साथ कई आवाजें आई बताओ बाबा।
बाबा ने सुट्टे की तरह सन्नाटे का आनंद लिया और बोले- ‘‘ मुझे दिख रहा है, साफ साफ दिख रहा है । शनिवार का दिन है, मांगने वाले घूम रहे हैं कि चढ़ाओ शनि महाराज को पानी। .... लोग कटोरी में दो चम्मच पानी ला कर चढ़ा रहे हैं। डिस्पोजेबल कपड़ों का प्रचलन हो गया है। नहाने की परंपरा समाप्त हो गई है। जिस तरह आम आदमी शादी के एक मात्र अवसर पर सूट पहन लेता है उसी तरह घुड़चढ़ी से पहले दूल्हे को ढ़ाई लीटर पानी से स्नान कराने विधान बन गया है। फिल्मों से नायिकाओं के स्नान दृष्य बंद हो गए हैं, क्योंकि इससे फिल्म का बजट बढ़ जाता है। लोग बाथरूम सीन वाली पुरानी फिल्मों पर टूटे पड़ रहे हैं । टायलेट में फ्लश सिस्टन की जगह पोटली सिस्टम प्रचलित हो गया है। मंजन-कुल्ले के लिए भी नया ड्राय सिस्टम है प्रचलन में आ गया है। देश के सबसे अमीर खंबानी बंधु रोजाना दो-तीन बार नहा कर ब्रेकिंग न्यूज में छा जाते हैं। मेहमानों का सत्कार काफी बाइट से हो रहा है। केवल अमीर घरों में बर्तन पोछा होता है । जिनके पास आधार कार्ड हैं उन्हें प्रति दिन एक लीटर पानी मिल रहा है । विज्ञापन छप रहे हैं कि पांच हजार की खरीदी पर एक लीटर पानी मुफ्त दिया जायेगा. ......
बस करो बाबा, अब रुलाओगे क्या !?! एक आवाज आई ।
कुछ अच्छा नहीं देख सकते क्या बाबा .... !! दूसरी आवाज आई ।
बाबा बोले –“ मैं वही देख रहा हूँ जो तुम बना रहे हो ।  कुछ अच्छा देखना चाहते हो तो उसके लिए अभी से कुछ अच्छा करना शुरू करो. .... पानी और वोट को बहुत सावधानी से खर्च करना सीखो लोगों ।  

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गुरुवार, 9 मार्च 2017

पशुबंदी और एटीएम से गोबर

किसी जमाने में वे अबे ओ बच्चा थे, फिर बच्चा बाबू कहलाये. सरकार में आ गए तो श्रीमंत बच्चा बाबू हो गए, स्मार्ट सिटी बनाने का हल्ला हुआ तो अब सर बी.बी. हैं. स्मार्ट सिटी बनाने की जिम्मेदारी सर बी.बी. पर भी है सो होली के ठीक पन्द्रह दिन पहले उन्होंने प्रजा के लिए दो आदेश निकाले कि  रात बारह बजे के बाद से नगर में पशुबंदी लागू की जा रही है, चौपाये पशुओं को नगर में रखना गैरकानूनी माना जायेगा, सारे चौपाये पशु तुरंत बाहर किये जायें. नगर चोर-उचक्कों, गुंडे-बदमाशों, हत्यारों-लुटेरों, भ्रष्टाचारियों, बलात्कारियों, झूटे-बेईमानों, लम्पट-पाखंडियों आदि दो-पाये पशुओं के रहने की जगह है. चौपाये अक्सर उनके काम में बाधा बनते हैं और यहाँ वहाँ गंदा करते रहते  हैं, इनसे नगर की शोभा प्रभावित होती है. बहुत सारे लोग सरकार की कल्याण योजनाओं का लाभ लेते हैं और पशुओं को चारा खिला कर श्रेय उनको दिया करते हैं ! इस पर तुरंत रोक लगाने का निर्णय लिया गया है. लेकिन उन नस्ली और पालतू कुत्तों को पशुबंदी से छूट रहेगी जिनके आधार कार्ड बनें होंगे. उन कुत्तों को भी छूट का लाभ मिलेगा जो भवन या प्लाट के मालिक हैं और अग्रिम संपत्ति कर जमा कर रहे हैं. उन सभी  गधों को भी स्मार्ट सिटी में रहने की छूट रहेगी जिनके नाम वोटर लिस्ट में आलरेडी दर्ज हैं  और जो  हर चुनाव में सरकार के हाथ मजबूत करते आये हैं.
दूसरा आदेश यह कि सारे लोग गोबर के कन्डो से होली बनाएंगे, कोई लकड़ी नहीं जलाएगा. कंडे बनाने के लिए केवल चौपाये पशुओं के गोबर का उपयोग किया जायेगा. इस मामले में कोई समझौता या छूट नहीं दी जायेगी. जिनके पास पुराने कंडे जमा हैं वे सक्षम अधिकारी के समक्ष घोषणा पत्र भर कर होली बना सकते हैं. बिना घोषणा वाले काले-कंडों से होली बनाना और जलाना गैरकानूनी होगा. कुछ आदेश प्रशासन को भी दिए कि वो काले-कंडों के मामले में सतर्क रहें और देखें  कि कौन लोग काले-कंडों से होली बना रहे हैं. इस बात की निगरानी रखें कि जब उनके पास चौपाये पशु नहीं हैं तो कंडे किसके गोबर से बनाये गए हैं ! गोबर में किसी और गोबर की मिलावट वाले कंडों पर सख्त कार्रवाई की जाये. प्रजा यदि गोबर के उदगम का संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाये तो उस पर गोबर तस्करी और मिलावट का केस बनाएँ.
जो सभ्य और सुसंस्कृत लोग गोबर से होली खेलते आये हैं उनके लिए प्रशासन जल्द से जल्द हर मोहल्ले में गोबर-एटीएम की व्यवस्था करे ताकि प्रजा अपने उपयोग के लिए मान्य-गोबर प्राप्त कर सके. इस बार की होली के लिए एटीएम से सीमित मात्र में गोबर निकाला जा सकेगा. भविष्य में जैसे जैसे गोबर की व्यवस्था होती जायेगी एटीएम चौबीस घंटे काम करने लगेंगे और भरपूर गोबर देने लगेंगे. इसी के साथ सर बी.बी. ने प्रजा को होली और स्मार्ट सिटी की बधाई दी.

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शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

अंतर मात्र दोपाये और चौपाये का

कश्मीर से कन्या कुमारी तक भारत एक है और यह बात आदमियों के साथ गधो पर भी लागू  होती है. इधर कुछ गैर राजनितिक जिज्ञासु पूछ रहे हैं कि आदमी और गधे में क्या अंतर है ? इस तरह का सवाल किसी गधे के सामने आये तो उसे भी ज्यादा सोचने की जरुरत नहीं होती, किन्तु गधे टीवी नहीं देखते हैं. प्राइम टाइम पर दनादन दुलात्तियां चल रहीं हैं जिसे बहस नाम दिया गया है. कुछ होते हैं जिन्हें लोग चिन्तक वगैरह कह कर प्रायः ख़ारिज कर दिया करते हैं, वे हर सवाल का जवाब गंभीरता से देते हैं. कायदा यह है कि जो चीज गंभीरता से दी जाये उसे गंभीरता से लिया भी जाना चाहिए. चिन्तक वैसे भी थोड़ा भारी प्राणी होता है, उस पर गंभीरता का गीलापन और आ जुड़े तो वजन बढता ही है. ऐसे ही चिन्तक किस्म के एक जी हैं, बोले - देखिये यह एक बहुत ही सामायिक और गूढ़ प्रश्न है. प्रबुद्ध समाज को यह देखना और समझना होगा कि गधा कौन है. अगर चौपाये और दोपाये से इस अंतर को कर रहे हैं तो निसंदेह हम नासमझ हैं. क्योंकि इतना अंतर तो मूर्ख भी जानते हैं. सो जरुरी है कि देश इस पर गहरे से चिंतन करे.
चिंतन को लेकर आप किसी तरह का खौफ मत खाइए. सामान्य रूप से चिंतन अच्छी चीज है. दरअसल चिंतन एक मज़बूरी होता है और कई बार शौक भी. यह दवा भी है और बीमारी भी. जब कोई चिंतन करने लगे तो उसे रोकना नहीं चाहिए. सुरक्षित यही है कि उसे अच्छी तरह से कर लेने दिया जाये. कई बार इसी से स्वास्थ में सुधार होने लगता है और लोग च्यवनप्राश को श्रेय देने लगते हैं. बड़े लोग जो बहुदा चिंतन में ही वक्त बिताया करते हैं और प्रायः दीर्धायु होते देखे गए हैं. चिंतन अनुलोम-विलोम दोनों प्रकार का होता है. सत्ता के जाते ही चिंतन विलोम होने लगता है. अगर कोई पूरी मेहनत से विलोम कर ले तो उसे अनुलोम का मौका भी मिल सकता है. खैर, इन सब बातों से आपको क्या लेना-देना. इस समय वक्त की दहलीज पर सवाल यह है कि आदमी और गधे में क्या अंतर है ?
सामान्य आदमी का ध्यान आदमी और गधे में उलझ गया है. जबकि मूल प्रश्न यहाँ अंतर है. अंतर समानता का विरोधी है. लेकिन जैसा कि सब जानते हैं कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं. जहाँ लोकतान्त्रिक मूल्यों का महत्त्व होता है वहाँ किसी भी तरह के अंतर को बहुत बुरा माना जाता है. लेकिन इससे अंतर मिटता थोड़ी है , आदमी और आदमी में अंतर होता है, गधे और गधे में भी, चाहे वो किसी एक ही राज्य के क्यों न हों. जब अंतर की ही खोज करते रहेंगे तो अंत में हमें समानता का नामोनिशान नहीं मिलेगा. इसलिए समय की मांग है कि समानता पर ध्यान केंद्रित किया जाये. लेकिन संसार में समान कुछ भी नहीं है. जो समान समझे जाते हैं उनमें भी अंतर होता है. एक माँ-बाप की संतानों में अंतर होता है. और तो और, आदमी जो सुबह था शाम उसमें अंतर होता है. सच पूछो तो समानता एक भ्रम है. हम अंतरों के बीच में से कुछ उठा कर समानता के माथे मार देते हैं. अगर सवाल होता कि आदमी और गधे में समानता क्या है तो बात जटिल हो जाती. भूख प्यास दोनों को लगती है, प्रेम और पैदा दोनों ही करते हैं, जीवन संघर्ष और मृत्यु दोनों के हिस्से में है. फिर भी कुछ है जो उनमें अंतर करता है. अगर भारत को दृष्टि में रखते हुए देंखे तो कह सकते हैं कि आदमी चुनाव लड़ सकता है गधा नहीं. दूसरा यह कि आदमी चुनाव में गधे को मुद्दा बना सकता है लेकिन गधे के लिए आदमी इस लायक भी नहीं है. कल जब चुनाव परिणाम आयेंगे तो कोई आदमी ही जीतेगा और वह अहसान फरामोश गधे का आभारी भी नहीं होगा. किसी ने जगह जगह हाथी बनवा कर अपनी छाती चौड़ी की. कल गधों की प्रतिमा बनवा कर कोई अपना फर्ज पूरा नहीं करेगा. यही अंतर है आदमी और गधे में.


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मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

टमाटर मंडी के बाहर कवि

दोनों वरिष्ठ कवि मंडी से टमाटर खरीद कर लौटे थे. एक जमाना था जब वे दो-चार कविताएं सुना कर टमाटर-बैंगन वगैरह इकठ्ठा कर लिया करते थे. उस समय कविता को ले कर लोगों में जबरदस्त संवेदना थी. कवितायें तो उनकी आज भी वैसी ही हैं, टमाटर भी सस्ते हैं लेकिन लोगों ने बर्दास्त करना सीख लिया है.  ज्वाला जी के पास छब्बीस रूपये थे, उन्होंने तेरह किलो टमाटर खरीदे और इस सफलता पर उनके अंदर तक एक शीतलता उतर आई थी. प्याला जी के पास थे तो तीस रुपये लेकिन पच्चीस रुपये तात्कालिक भविष्य के लिए बचा कर उन्होंने मात्र ढाई किलो टमाटर खरीदे. खबरों से पता तो यह चला था कि किसान मंडी के गेट पर टमाटर फैंक कर चले जाते हैं. लेकिन वो कल की बात थी, आज टमाटर का भाव दो रुपये किलो रहा. प्याला जी की जेब अक्सर बदनाम रहती है इसलिए वे स्वभाव के विपरीत स्थाई गंभीर हैं. बोले- कितनी भीड़ थी मंडी में ! सारा शहर ही उमड़ पड़ा टमाटर खरीदने के लिए. इतने लोग नहीं आये होते तो शायद आज भी किसान फैंक कर चले जाते.
ज्वाला जी को अब कोई टेंशन नहीं था. साल भर की चटनी के लिए वे पर्याप्त टमाटर खरीद चुके थे. लिहाजा अब उनका संवेदनशील हो जाना सुरक्षित था, -- वो तो ठीक है, लेकिन किसान की सोचो. उस बेचारे की तो मजदूरी भी नहीं निकली. प्यालाजी नासमझ नहीं हैं, उन्होंने लापरवाही से जवाब दिया किसान की किसान जाने या फिर जाने सरकार. गेंहूँ,चावल,दाल वगैरह सब दो रुपये किलो मिले तो अबकी बार,रिपीट सरकार.
जरा ये तो सोचो, भाव नहीं मिलेंगे तो किसान आत्महत्या करने लगेंगे. ज्वालाजी जन-ज्वाला होने के मूड में आने लगे.
उन्हें आत्महत्या नहीं करना चाहिए. साहित्य की मंडी में हमारी कविता को कभी भाव नहीं मिले तो क्या हमने आत्महत्या की ?! प्यालाजी अपने अनुभव से ठोस तर्क दिया.
ज्वालाजी को लगा कि उन पर ताना कसा गया है, - दूसरों की तो पता नहीं लेकिन मेरी कविता को तो भाव मिलता है.
हां मिलता है, दो रुपये किलो. .... कल मैंने अखबार की रद्दी तीस रुपये में तीन किलो बेची थी. प्यालाजी ने अपना गुस्सा निकला.
दो रुपये ही सही, पर मैं मुफ्त में अपनी कविता फैंकता नहीं हूँ, कभी फेसबुक पर कभी यहाँ वहाँ . ज्वालाजी ने भी आक्रमण किया.
इस मुकाम पर बात बिगड सकती थी लेकिन दोनों ने हमेशा की तरह गम खाया. कुछ देर के लिए दोनों के बीच एक सन्नाटा सा पसर गया. साहित्यकारों का ऐसा है कि जब भी सन्नाटा पड़ता है तो उनमें समझौते की चेतना जागृत हो जाती है. पहल प्यालाजी ने की - अगर किसान खेती करने के साथ कविता भी करने लगें तो उनमें बर्दाश्त करने की क्षमता का विकास होगा. सुन कर ज्वालाजी ने लगभग घूरते हुए उन्हें हिदायत दी- कैसी बातें करते हो आप !! पहले ही बहुत कम्पटीशन है कविता में. जो भी रिटायर हो रहा है सीधे कविता ठोंक रहा है और काफी-डोसा खिला कर सुना रहा है !! और पता है किसानों के पास बुवाई-कटाई के बाद कितना समय होता है ! वो कविता के खेत बोने लगेंगे और आदत के अनुसार यहाँ लाकर ढोलने लगेंगे तो हमारा क्या होगा !? प्यालाजी को अपनी गलती का अहसास हुआ, बोले मुझे क्या, चिंता की शुरुवात तो तुम्हीं ने की थी. तुम्ही बताओ क्या करें ? ज्वाला जी सोच कर बोले- किसान पर कविता लिखो, और किसी गोष्ठी में ढोल आओ. ... बस हो गया फर्ज पूरा.

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